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विनोबा भावे जयंती विशेष: फिर अवश्य लौटकर आएंगे विनोबा और बापू

हिन्दुस्तान लोगो हिन्दुस्तान 12-09-2018 नई दिल्ली, पंकज पाराशर

विनोबा भावे © नई दिल्ली, पंकज पाराशर विनोबा भावे

विदर्भ, महाराष्ट्र का वह हिस्सा जहां से लगातार किसानों की आत्महत्याएं सुर्खियां बनती हैं। इस कारण पूरी दुनिया के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विश्लेषकों के साथ-साथ शोधार्थियों के लिए भी यह इलाका अध्ययन का केंद्र बन चुका है। मैं भी इसी उद्देश्य से विदर्भ गया। लेकिन जहां समस्याएं होती हैं, प्रकृति वहीं उनका निदान भी देती है। विदर्भ के वर्धा जिले में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का आश्रम सेवाग्राम और बापू के व्यावहारिक अनुयायी संत विनोबा भावे का परमधाम आश्रम हैं। विदर्भ की समस्या बदहाल गांव और आर्थिक संकट से घिरे मौत को गले लगाते किसान हैं तो निदान सेवाग्राम और परमधाम में है।

आज ‘भूदान’ के प्रणेता संत विनोबा भावे का जन्मदिवस है तो ध्यान उन्हीं पर लगाते हैं। बापू के सेवाग्राम से विदा लेकर पवनार पहुंचे। दोपहर में मध्यावकाश के चलते आश्रम के दरवाजे बंद थे। द्वार पर टंगे बोर्ड पर लिखा था कि करीब एक घंटे बाद आश्रम दोबारा खुलेगा। सूखे पत्थरों के बीच से रिसती धाम नदी के किनारे बैठकर इंतजार का वक्त कब बीत गया, पता ही नहीं चला। परमधाम आश्रम में प्रवेश किया तो वहां भी सेवाग्राम जैसी शांति थी। विनोबा जी की कुटिया से पहले छोटा सा कार्यालय और पुस्तकालय है। लकड़ी की छत वाले शांत आश्रम में प्रवेश के साथ ही विदर्भ की दुदर्शा, अपनी सारी चिंताएं, अशांति और आगे के कार्यक्रम दिमाग से स्वत: ही निकल गए।

बाल विजय जी से मुलाकात

लंबी एक मंजिला लकड़ी की इमारत के अंतिम कमरे में विनोबा जी समाधिस्थ हैं। उसी कमरे के बाहर बरामदे के अंतिम छोर पर सफेद कपड़ों में लिपटे, लंबी सफेद दाढ़ी और बेहद हल्के शरीर वाले बुजुर्ग बैठे थे। वह कोई और नहीं, महज 14 वर्ष की उम्र से विनोबा जी के साथ जुड़े उनके निजी सहायक बाल विजय जी थे। बाल विजय जी अब 92 वर्ष के हैं। उनसे चर्चा शुरू हुई। विदर्भ के हालात पर उन्होंने कहा, देश को आजादी मिले 71 वर्ष हो गए हैं। लेकिन गांव और किसान के हालात तो बद से बदतर हुए हैं। आने वाले समय में और बुरे हालात होंगे। दरअसल, हम जिस आर्थिक नीति का अनुसरण कर रहे हैं, उससे गांवों का विकास संभव नहीं है। अब सरकारें नगरों के विकास पर जोर दे रही हैं। गांवों का विकास किए बिना शहरों का विकास संभव नहीं है। गांव खाली हो रहे हैं और शहरों में बेतहाशा भीड़ बढ़ रही है।

सर्वोद्य के बिना सुख संभव नहीं

बाल विजय ने कहा, बापू और आचार्य जी के बाद अगर कोई नेता आया तो वो डा.एपीजे अब्दुल कलाम थे। उन्होंने बापू और आचार्य की तरह स्मार्ट विलेज की बात कही। अब सरकार स्मार्ट सिटी बसा रही हैं। जब तक स्मार्ट विलेज नहीं होंगे तब तक स्मार्ट सिटी नहीं बनेंगे। तब तक किसान खुशहाल नहीं होगा। गांव में गांव वाले खुश नहीं और शहर में शहर वाले दुखी हैं। शहर के लोगों के पास रोजगार नहीं होंगे। एक दिन लौटकर बापू और आचार्य जी के दर्शन पर आना होगा। ग्राम स्वराज से बड़ा विकास का मॉडल कोई नहीं है। सर्वोद्य के बिना सुख नहीं हो सकता।

विनोबा दिल्ली नहीं जाते थे

भारत आजाद हुआ तो देश की सरकार के सामने विकास के दो मॉडल थे। एक मॉडल प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का था। वह इंग्लैंड और रूस के आर्थिक-औद्योगिक मॉडल को मिश्रित करके आगे बढ़ने के प्रबल समर्थक थे। दूसरा गांधीवादी मॉडल था। जिसके तहत हिन्दी, खादी, स्वदेशी, नई तालीम, ग्राम पंचायतों, दलितों, महिलाओं और मजदूरों का गांवों के संसाधानों का उपयोग करके ग्रामोद्योग के जरिए विकास करना था। बाल विजय कहते हैं कि यह टिकाऊ विकास है। जिसके जरिए गांव से शहर की ओर पलायन रोका जा सकता है। विनोबा जी, बापू के इसी मॉडल पर आगे बढ़कर उनके सर्वोद्य को हासिल करना चाहते थे। लेकिन नेहरू जी की चली और मशीनीकरण के जरिए मिश्रित औद्योगिक-आर्थिक व्यवस्था पर तेजी से काम शुरू हुआ। जब नेहरू जी ने योजना आयोग बनाया तो उसमें विनोबा जी को रखा गया। लेकिन विनोबा जी कभी योजना आयोग की बैठकों में नहीं गए। दरअसल, उन्होंने दिल्ली नहीं जाने का प्रण ले रखा था। भूदान आंदोलन के लिए देश के भ्रमण पर निकले तो दिल्ली के इर्द-गिर्द चारों ओर गए किन्तु दिल्ली नहीं गए थे। इसके पीछे क्या कारण था? इस सवाल का जवाब देते हुए बाल विजय जी ने कहा, दो वजह थीं। एक, दिल्ली के विकास मॉडल से वह सहमत नहीं थे और दूसरा कारण बापू की हत्या थी। दिल्ली में बापू की हत्या के बाद विनोबा जी को बड़ा आघात लगा था।

मैंने बस आचार्य जी के फोटो खींचे

भूदान आंदोलन के दौरान हर समय उनके साथ रहने वाले गौतम बजाज अब 80 वर्ष के हैं। गौतम, विनोबा जी के फोटोग्राफर थे। हाल ही में उन्होंने विनोबा के चुनिंदा एक हजार फोटो पुरी दुनिया के लिए मुफ्त प्रसारित किए हैं। गौतम जी ने कहा, उनके बारे में क्या-क्या कहूं। मैंने उनके साथ पूरे देश का भ्रमण किया। पैदल चलते-चलते उनके पांव जल गए। पांवों से खून रिसता था लेकिन वह फिर भी चलते थे। 15 नवंबर 1983 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके अंतिम संस्कार का फोटो लिया और उसके बाद मैंने कोई फोटो नहीं खींचा। अपने सारे कैमरे लोगों को बांट दिए।

बापू के सिद्धांतों को व्यवहारिक रूप दिया

महात्मा गांधी का सबसे बड़ा सिद्धांत ट्रस्टीशिप था। मतलब, अपनी जरूरतों को पूरा करने के बाद जो धन है, वह समाज की धरोहर है। धनिक केवल उसका ट्रस्टी है। जरूरत पड़ने पर यह धन समाज के लिए खर्च करना चाहिए। बाल विजय जी कहते हैं कि ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को ही विनोबा ने भूदान आंदोलन के जरिए व्यावहारिक रूप दिया था। महिला उत्थान, ग्रामोद्योग और सर्वोद्य को भी विनोबा जी ने मूर्त रूप दिया। भावे जी का पहला आश्रम ब्रह्म विद्या मंदिर इसका साक्षात उदाहरण है। ब्रह्म विद्या मंदिर का संचालन केवल महिलाएं करती हैं। वहां महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उनके आत्मबल पैदा करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। बाल विजय जी कहते हैं, मुझे पूरा भरोसा है, एक दिन भावे जी और बापू अवश्य लौटकर आएंगे। हम राजनीतिक रूप से आजाद हैं लेकिन नैतिक आजादी की अभी जरूरत है। उसके लिए फिर संघर्ष होगा। तब विदर्भ में परेशानी कहा रहेगी।

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